मैं पर-ब्रह्म ,जगत हित कारण, माया भरम परो ।
प्रकृति -माया स्वयं तुम्ही, मम अन्तर वास करो।
एक तत्व गुन, भासें जग दुई , जगमग रूप धरो।
राधा -श्याम एक ही रूपक ,विलगि न भाव भरो।
रोम-रोम हर श्वाँस श्वाँस में , राधे! तुम विचरो ।
thanks to डा. श्याम गुप्त (http://saahityshyam.blogspot.in/2009/07/blog-post_21.html)


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