samiti's comment : "ऐसा नहीं है की ये प्रतीकात्मकता मात्र है .. जिस रूप में आप उन्हें स्वीकार करते है .. आपके लिए वे उसी रूप में सदैव सर्वत्र रहते है .. ये उनका सामर्थ्य एवं उनकी कृपालुता है .. महादेव सदैव है, सर्वत्र है. .... आपके इष्ट देवता ही ईश्वर है और ईश्वर ही आपके इष्ट देवता है .. आप उन्हें किसी भी रूप में भजिये, किसी भी नाम से पुकारिए, वे स्वीकार कर लेते है ... उनको atleast इतनी understanding तो है ही, की ये मेरे बदले किसी और को नहीं पूजता, मुझे ही address करता है - इतना भी न माना तो उन्हें माना ही क्या ... सभी उपासनाओ को वे स्वीकार करते है, भक्त के भाव के अनुरूप लीला भी करते हैं, ये उनकी दयालुता और उदारता है .. भक्त-अभक्त को कर्म का फल निश्चित मिलता है, ये उनका न्याय है .. दंड से दोष को निराकृत कर आनंद प्राप्ति के असंख्य अवसर देना, यही उनकी सबसे बड़ी कृपा है" --- श्री गुरूजी के प्रवचनों से.
HAR HAR HAR MAHADEV .....
There are many which are named as Shivastaka. The one presented here is written by Adi guru Shankaracharya himself and praises the parambrahma Shiva.
तस्मै नम: परमकारणकारणाय , दिप्तोज्ज्वलज्ज्वलित पिङ्गललोचनाय ।
नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय , ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नम: शिवाय ॥ 1 ॥
Salutation to thee, O Shiva, who is the prime cause of all causes, whose eyes shines bright like fire and whose blessing is sough even by Brahma, Vishnu and Indra. ....
There are many which are named as Shivastaka. The one presented here is written by Adi guru Shankaracharya himself and praises the parambrahma Shiva.
तस्मै नम: परमकारणकारणाय , दिप्तोज्ज्वलज्ज्वलित पिङ्गललोचनाय ।
नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय , ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नम: शिवाय ॥ 1 ॥
Salutation to thee, O Shiva, who is the prime cause of all causes, whose eyes shines bright like fire and whose blessing is sough even by Brahma, Vishnu and Indra. ....
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