सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानं ॥ ( मुण्डक-उपनिषद 3.1.6)

सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही वह (देवयान) मार्ग परिपूर्ण है, जिसके द्वारा कामना रहित ऋषिगण, जहां सत्य का श्रेष्ठ भण्डार (परम आनंद) है, उस (परमपद) को प्राप्त करते हैं।

Truth alone triumphs; not falsehood. Through truth the divine path is spread out by which the sages whose desires have been completely fulfilled, reach to where is that supreme treasure of Truth.

सोमवार, 28 मई 2012

मित्रावरुण शक्ति (बैटरी का आविष्कार) .....


  • Sanatan Dharma Prachar Samiti shared ...... बैटरी का आविष्कार
    समान्यतः हम मानते हैं की विद्युत बैटरी का आविष्कार बेंजामिन फ्रेंकलिन ने किया था, किन्तु आपको यह जानकार सुखद आश्चर्य होगा की बैटरी के बारे में सर्वप्रथम एक सनातन धर्मी ऋषि ने विश्व को बतलाया । यह जानकारी नरेश आर्य जी के सौजन्य से प्राप्त हुई है।


    अगस्त्य संहिता में महर्षि अगस्त्य ने बैटरी निर्माण की विधि का वर्णन किया था । अगस्त्य संहिता में एक सूत्र हैः संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌। छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥ दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:। संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥ अर्थात् एक मिट्टी का बर्तन लें, उसमें अच्छी प्रकार से साफ किया गया ताम्रपत्र और शिखिग्रीवा (मोर के गर्दन जैसा पदार्थ अर्थात् कॉपरसल्फेट) डालें। फिर उस बर्तन को लकड़ी के गीले बुरादे से भर दें। उसके बाद लकड़ी के गीले बुरादे के ऊपर पारा से आच्छादित दस्त लोष्ट (mercury-amalgamated zinc sheet) रखे। इस प्रकार दोनों के संयोग से अर्थात् तारों के द्वारा जोड़ने पर मित्रावरुणशक्ति की उत्पत्ति होगी। यहाँ पर उल्लेखनीय है कि यह प्रयोग करके भी देखा गया है जिसके परिणामस्वरूप 1.138 वोल्ट तथा 23 mA धारा वाली विद्युत उत्पन्न हुई। स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था (नागपुर) के द्वारा उसके चौथे वार्षिक सभा में ७ अगस्त, १९९० को इस प्रयोग का प्रदर्शन भी विद्वानों तथा सर्वसाधारण के समक्ष किया गया। अगस्त्य संहिता में आगे लिखा हैः अनेन जलभंगोस्ति प्राणो दानेषु वायुषु। एवं शतानां कुंभानांसंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥ अर्थात सौ कुम्भों (अर्थात् उपरोक्त प्रकार से बने तथा श्रृंखला में जोड़े गए सौ सेलों) की शक्ति का पानी में प्रयोग करने पर पानी अपना रूप बदल कर प्राण वायु (ऑक्सीजन) और उदान वायु (हाइड्रोजन) में परिवर्तित हो जाएगा। फिर लिखा गया हैः वायुबन्धकवस्त्रेण निबद्धो यानमस्तके उदान स्वलघुत्वे बिभर्त्याकाशयानकम्‌। अर्थात् उदान वायु (हाइड्रोजन) को बन्धक वस्त्र (air tight cloth) द्वारा निबद्ध किया जाए तो वह विमान विद्या (aerodynamics) के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। स्पष्ट है कि यह आज के विद्युत बैटरी का सूत्र (Formula for Electric battery) ही है। 

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