सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानं ॥ ( मुण्डक-उपनिषद 3.1.6)

सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही वह (देवयान) मार्ग परिपूर्ण है, जिसके द्वारा कामना रहित ऋषिगण, जहां सत्य का श्रेष्ठ भण्डार (परम आनंद) है, उस (परमपद) को प्राप्त करते हैं।

Truth alone triumphs; not falsehood. Through truth the divine path is spread out by which the sages whose desires have been completely fulfilled, reach to where is that supreme treasure of Truth.

शुक्रवार, 4 मई 2012

"You don't have a name; You don't have a form, but we approachYou with thousands of names and thousands of forms. You accept all our approaches."

त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति 
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च । 
रुचिनां वैचित्र्याद्ऋजुकुटिलनानापथजुषां 
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ 
मतो सांख्य योग, पशुपतिमत वैष्णवमत, 
वळी वेद मार्ग, विविध पथ छे उन्नति तणां; 
स्वीकारे छे लोको रुचि मुजब लागे परम ते, 
तने पहोंचे छे सौ पथ जलधि ने जेम जल सौ ॥ 
          त्रयी सांख्य, योग, पाशुपत मत और वैष्णव मत, इत्यादि इन भिन्न, भिन्न प्रस्थानों में से रुचि की विचित्रता के अनुसार कोई एक को श्रेष्ठ और अन्य को कनिष्ठ तप कहेगा ! (पर) सरल, अथवा टेढे मार्ग से जानेवाली सभी नदियाँ, जैसे अंत में समुद्र में जा मिलती है, वैसे हि रुचि वैचित्र्य से भिन्न भिन्न मार्गो का अनुसरण करनेवाले, सभी का अंतिम स्थान आप ही हैं । 
         The different practices based on the three Vedas, SaMkhya, Yoga, Pashupata, VaiShNava etc. say this is supreior, that is superior etc. But as the sea is the final resting place for all types of streams, You (God) are the final reaching place for all those paths. - shiva mahimna stotram

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