त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचिनां वैचित्र्याद्ऋजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥
मतो सांख्य योग, पशुपतिमत वैष्णवमत,
वळी वेद मार्ग, विविध पथ छे उन्नति तणां;
स्वीकारे छे लोको रुचि मुजब लागे परम ते,
तने पहोंचे छे सौ पथ जलधि ने जेम जल सौ ॥
त्रयी सांख्य, योग, पाशुपत मत और वैष्णव मत, इत्यादि इन भिन्न, भिन्न प्रस्थानों में से रुचि की विचित्रता के अनुसार कोई एक को श्रेष्ठ और अन्य को कनिष्ठ तप कहेगा ! (पर) सरल, अथवा टेढे मार्ग से जानेवाली सभी नदियाँ, जैसे अंत में समुद्र में जा मिलती है, वैसे हि रुचि वैचित्र्य से भिन्न भिन्न मार्गो का अनुसरण करनेवाले, सभी का अंतिम स्थान आप ही हैं ।
The different practices based on the three Vedas, SaMkhya, Yoga, Pashupata, VaiShNava etc. say this is supreior, that is superior etc. But as the sea is the final resting place for all types of streams, You (God) are the final reaching place for all those paths.
- shiva mahimna stotram
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें