सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्यात्मकामो यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानं ॥ ( मुण्डक-उपनिषद 3.1.6)

सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही वह (देवयान) मार्ग परिपूर्ण है, जिसके द्वारा कामना रहित ऋषिगण, जहां सत्य का श्रेष्ठ भण्डार (परम आनंद) है, उस (परमपद) को प्राप्त करते हैं।

Truth alone triumphs; not falsehood. Through truth the divine path is spread out by which the sages whose desires have been completely fulfilled, reach to where is that supreme treasure of Truth.

रविवार, 27 मई 2012

हे जगदीश देव, मन मेरा- सत्य सनातन धर्म न छोड़े ....

हे जगदीश देव, मन मेरा- सत्य सनातन धर्म न छोड़े। 
सुख में तुझ को भूल न जावे, नेक न संकट में घबरावे, 
धीर कहाय अधीर न होवे, तमक न तार क्षमा का तोड़े। 
त्याग जीव के जीवन पथ को, टेढ़ा हांक न दे तन-रथ को, 
अति चंचल इन्द्रिय-घोड़ों की, भ्रम से उलटी बाग न मोड़े। 
होकर शुद्ध महाव्रत धारे, मलिन किसी का माल न मारे, 
धार घमण्ड क्रोध-पाहन से, हा न प्रेम-रस का घट फोड़े। 
ऊँचे विमल विचार चढ़ावे, तप से प्रातिभ ज्ञान बढ़ावे, 
हठ तज मान करे विद्या का, ‘शंकर’ श्रुति का सार निचोड़े। 
रचनाकार: नाथूराम शर्मा 'शंकर' 

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